धू धू जल रहा था लहू जवानों का,
धरती मां को खुद पर नाज़ आ रहा था,
पिघला दिल करोड़ों भारतीय का,
एक अपना ही शख्स अपनो को मार रहा था।
कैद पिजङे में जवानी को त्याग देनी पङी,
हाथ में हथियार फिर भी जान देनी पङी,
सुलगते देख अपने हथियारों को आंख भरनी पङी,
जिस धरती पर पैदा हुए उसी की कोख मे सर झुकानी पङी।
कलेजे पर रख पत्थर कितनी मां ने आंचल सुना किया,
आंखों में अश्क लिए कितने पिता ने हिंदुस्तान को कर्ज दिया,
क्या लिखूँ उन शहीद जवानों को....
जिन्होने अपना जलता शरीर
तपती आह बहते लहू से धरती माता को आखिरी सलाम किया।।
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