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उस ज़ालिम मोहब्बत की दास्ताँ

                
                                                         
                            एक बार हमने भी मोहब्बत की थी,
                                                                 
                            
उस ज़ालिम सी हसीन तसवीर से।
जो हर रोज़ दिल को हँसा जाती थी,
मुस्कानों की प्यारी सी ताबीर से।

वो भी हमसे इश्क़ जताती थी,
हर पल, हर साँस में समाती थी।
ज़ुबाँ उसकी जैसे कोई कटार हो,
बातों-बातों में दिल चुराती थी।

हमने अपना दिल उसे दे डाला,
बिना किसी शर्त, बिना कोई हाला।
वो ख्वाबों में जैसे घर कर गई थी,
जैसे मोहब्बत खुद ही संभाला।

पर वक़्त ने फिर दगा कर दिया,
हमारा हर ख्वाब चुरा लिया।
वो छूटी ऐसे जैसे कभी थी ही नहीं,
हमें बस तन्हा बना दिया।

अब यादें हैं, बस बातें पुरानी,
वो गलियाँ, वो शामें सुहानी।
दिल कहता है हर उस मोड़ पे —
जहाँ उससे मुलाक़ात होती थी कहानी

उन्हीं दरख़्तों की ओट में जब तुझसे मिला करता था,
तब वो भी हरे-भरे नज़र आते थे,
अब तो ज़ालिम कुछ शर्म कर —
मेरी ख़ातिर नहीं, तो उन सूखे दरख़्तों की ही ख़ातिर मिल लिया कर...
- अंकित पंडित
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9 महीने पहले

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