हूं मैं मुजफ्फरपुर में
हूं कहां मैं दूर में?
रात के दो बजे हैं
सुनसान सड़कें हैं
टेम्पो वाले पास आ रहे हैं
" कहां जाना है,सर" पूछते जा रहे हैं
बतिया रहे हैं, प्यार से
बोल रहे हैं, दुलार से
यही खासियत है मेरे मुजफ्फरपुर की
जिसके कारण याद आती है मुजफ्फरपुर की
लीची की मीठास लिए
आस और विश्वास लिए
लोग बतियाते हैं
जो यहां आते हैं
यहीं के हो जाते हैं
यहां के प्यार में खो जाते हैं
आ गया हूं मैं भीखन पुर में
हां जी, हूं मैं मुजफ्फरपुर में
बाबा गरीबनाथ बुलाते हैं
तभी तो हम यहां आते हैं
कविता तो इसके रग रग में है
सभी सदा साहित्यिक रंग में हैं
सड़क भी चौड़े चौड़े
यहां लोगों के दिल भी हैं लंबे चौड़े
जब जब मैं यहां आता हूं
बस यहीं का हो जाता हूं
हिंदुस्तान का कोहिनूर ऐसे ही नहीं है मुजफ्फरपुर
यहां है नहीं कोई अहंकार में चूर
है नहीं यह पटना से दूर
सुंदर सुंदर पेड़ पौधे मुझे लुभाते हैं
सदा प्यार से ये मुझे बुलाते हैं
चाहता हूं मुजफ्फरपुर! मैं और तुझे प्यार करूं
कुछ करके काम बड़ा मैं प्यार का इजहार करूं
मेरे प्यारे मुजफ्फरपुर!
हूं मैं कहां तुमसे दूर?
मेरे प्यारे शहर
तेरे दिल में है मेरा घर।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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