मैं चला पटना से गया
इसके पहले नहीं गया
था मैं कभी गया
रेल के डिब्बे में थी भीड़ भारी
थी जनता गर्मी से परेशान प्यारी
जहानाबाद में रेल रूकी
बढ़ी सबके दिल की धुकधुकी
लोग चिल्ला रहे थे एक दूसरे पर
फेंक रहे थे रूमाल दूर से सीट पर
लड़की लड़के बुढ़े और जवान
सभी दिखते थे खूब परेशान
टी.टी. सारे थे लापता
पुलिस का भी था न पता
सभी सोच रहे थे कौन सिर खपाए
है जिसको जाना जाए
या कहीं नहीं जाए
कौन मार खाए?
कौन टिकट जांच करने जाए
पर खोमचे वाले उसी भीड़ में घुस जाते थे
और अपना सामान बेच कर निकल जाते थे
ऐसी भीड़ से भगवान मुझे बचाए
सकुशल मुझे गया पहुंचाए।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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