दिन,रथ पर
चढ़ कर
मंथर मंथर गति से जा रहा है
गगन में अब अंधेरा छा रहा है
मंदिर में कोई भजन गा रहा है
मस्जिद में कोई जा रहा है
मंदिर में कोई जा रहा है
संध्या सुंदरी सकुचा रही है
देखो खूब वह लजा रही है
धीरे धीरे धरा पर वह आ रही है
कुछ कुछ वह गुनगुना रही है
संदेश सीधा है जो आता है
वह एक दिन चला जाता है
"तो क्यों वह मन में अहं लाता है?"
अहंकार तो सबका चला जाता है
अहंकार तो हम सबको खा जाता है
अहंकार दिखाना, मूर्खता की है निशानी
अहंकार दिखाना है एक नादानी।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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