आइए मेरे गया में
अध्यात्म की छाया में
भगवान विष्णु की माया में
गयासुर की काया में
महा बुद्ध के छाया में
पीपल की छाया में
फल्गु के छत्रछाया में
यह ऐतिहासिक शहर है
यह सांस्कृतिक शहर है
यह साहित्यिक शहर है
यह तीर्थ का शहर है
यहां जागरण हर प्रहर है
यहां लोग करते पिंडदान हैं
यहां लोग देते दान हैं
यहां श्रृषि लगाते ध्यान हैं
यहां विश्व विहार है
यहां बहार ही बहार है
यहां भिखना पहाड़ है
यहां सहज की दहाड़ है
यहां वेद मंत्रों का होता उच्चार है
यहां हर धर्म स्वीकार है
यहां बौद्ध विहार है
यहां हिंदू हजार हैं
यहां जैनी आते बार बार हैं
यहां बौद्ध आते बार बार हैं
यहां कोई करता फलाहार है
यहां किसी का दुग्ध आहार है
यहां कोई करता जलाहार है
यहां पितृपक्ष मेला में लोगों की भरमार है
यहां मिलता रोजगार है
यहां बड़ा बड़ा व्यापार है
यहां कई विद्यालय हैं
यहां विश्व विद्यालय है
यहां बहती ज्ञान की धारा है
यह गया हमारा है
यह बड़ा न्यारा है
यह बड़ा प्यारा है
आइए सड़क से
आइए रेल से
आइए वायु वान से
मैं भी आया गया में
आप आइए मेरे गया में।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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