बहुत याद आती हो
मुझे क्यो सताती हो
पल पल अपनी यादों
का छाप छोड़ कर
क्यो चली जाती हो
तुम इतनी प्यारी हो
लगती जहां से न्यारी हो
तुम्हे देखता हूँ तो तुम
धरा सी नज़र आती हो
प्रकति की सुंदर छटाओं
सी तुममे हर वो बातें है
मैं ये नही कहता कि तुम
प्रकृति हो,पर प्रकृति से लबालब
उसकी ही बनाई हुई
अद्भुत उपहार हो
जो जीवन की जीती जागती
मेरी हर मनुहार हो
तुम हो तो मैं हूँ,मैं हूँ तो तुम हो
मेरे हर सांस- सांस पर एक तेरा
ही हुकूमत हर बार हो
जो बरसो से दरबदर हो मैं ढूंढ
रहा था,अश्रुपूरित नयनो से
तुझे खुद में पाने के
प्रयासरत में मै आज एक तुझमें ही
समाहित होकर जीवन पर्यन्त
तक रहना चाहता हूँ
हर अंधियारों से लड़कर
तुम्हारे जीवन में रश्मियों की
लड़ियां बिखेरना चाहता हूँ
ऐसा मेरे हृदय के पट द्वार
खोल कर प्रवेश करने वाला
वो साथी जिसका नाम
जिह्वा बोलने से लड़खड़ा रही है
न जाने क्यों..?
शायद उसके लिए आज भी
मेरे हृदय में प्रेम की नदी
की लहर उमड़ रही है
वो हमराही,जिसकी बातें
मेरे ह्रदय पटल पर विराजमान
है, जो गुंजित होकर मेरे
कानों तक आ टकरा रही है
जिसे सुनकर,अहसास कर मन
में अनेको घण्टिया बजने लग रही है
अंजली श्रीवास्तव
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