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कभी दोस्त बनकर सुनती है मुझे हवा।

                
                                                         
                            सरगम-सी गाकर,
                                                                 
                            
ख़ामोशी से कुछ कहती है हवा,
“बैठो मेरे पास यहीं तुम,
अपने आँचल में सुलाऊँ तुम्हें ज़रा।

कह दो मुझसे वो बातें,
जो सताती रहती हैं तुम्हें सदा,
कुछ कहना हो अगर तुम्हें,
तो मुझसे कह दो वो बातें ज़रा।

कोई समझे या न समझे तुम्हें,
मैंने तो तुम्हारा अनकहा भी सुना,
तुम्हारी आँखों में छिपे हर दर्द को,
बिन शब्दों के ही पहचाना।

आँखें मूँदे बैठी रहती हो,
जाने किन ख़यालों में खोई रहती हो,
दुनिया से बेख़बर होकर,
कुछ पलों के लिए,
मैं अपने आँचल में सुला दूँ तुम्हें ज़रा।

हवा ने अपने आँचल में सुलाकर,
ममता से आकर छुआ,
जैसे माँ ने माथा सहलाकर,
बिन बोले ही सब कुछ सुन लिया।

सरगम-सी गाकर,
ख़ामोशी से कुछ कहती है हवा,
कभी माँ बनकर सहलाती है,
कभी दोस्त बनकर सुनती है मुझे हवा।
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एक घंटा पहले

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