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बेरोज़गारी और उम्मीद

                
                                                         
                            ❝ हालात से हारे हुए लोग,
                                                                 
                            
अक्सर खामोश रहा करते हैं,
दिल में सपनों का समंदर लिए,
चेहरे पर मायूस रहा करते हैं।

किताबों में जो इरादे लिखे थे,
वो आज धुंधले से लगते हैं,
डिग्रियों के बोझ तले दबकर,
सपने अधूरे से लगते हैं।

सुबह अख़बार उठाते हैं उम्मीद से,
शायद आज कोई मौका होगा,
पर हर बार नौकरी के इश्तिहार में,
सिर्फ़ मायूसी का धुआँ होता है।

माँ-बाप की उम्मीदें आँखों में तैरती हैं,
उनकी थकी मुस्कान बोझिल लगती है,
जब कोई पूछ ले "नौकरी लगी?"
तो अपनी रूह ही बोझिल लगती है।

हालात मजबूर कर देते हैं कई बार,
कि ख्वाहिशें बेचनी पड़ती हैं,
रोटी की तलाश में अक्सर,
ख़ुद्दारी को तोड़नी पड़ती है।

ये बेरोज़गारी सिर्फ़ जेब खाली नहीं करती,
ये आत्मविश्वास भी तोड़ देती है,
हिम्मत वाले इंसान को भी,
अंदर से खोखला कर देती है।

मगर याद रखो ये ठहराव ही,
एक दिन नया सवेरा लाएगा,
ये अंधेरा चाहे जितना गहरा हो,
सूरज फिर से चमक कर आएगा।

इसलिए खामोश रहकर भी,
दिल में उम्मीद ज़िंदा रखना,
बेरोज़गारी चाहे कितनी भी लंबी हो,
हौसलों का आसमान हमेशा ऊँचा रखना। 
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 महीने पहले

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