पहले पुरुष ने स्त्री के जन्म को अस्वीकार किया
फिर स्त्री ने पुरुष में प्रेम को जन्म दिलवाया...
अब पुरुष ने स्त्री को बनाया,
तो स्त्री में भी पुरुष की पहले वाली
घृणा का तत्व चला आया...
जब फिर से स्त्री ने स्त्री को बनाया,
तब पुरुष उसे पहचान नहीं पाया...
पुरुष मिटाकर तलाशता रहा, स्त्री को
स्त्री-पुरुष मिटते ही रहे, स्त्री-पुरुष होने में...
—अनीता 'निधि'
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