आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मिटते ही रहे स्त्री पुरुष होने में...

                
                                                         
                            पहले पुरुष ने स्त्री के जन्म को अस्वीकार किया
                                                                 
                            
फिर स्त्री ने पुरुष में प्रेम को जन्म दिलवाया...

अब पुरुष ने स्त्री को बनाया,
तो स्त्री में भी पुरुष की पहले वाली
घृणा का तत्व चला आया...

जब फिर से स्त्री ने स्त्री को बनाया,
तब पुरुष उसे पहचान नहीं पाया...

पुरुष मिटाकर तलाशता रहा, स्त्री को
स्त्री-पुरुष मिटते ही रहे, स्त्री-पुरुष होने में...

—अनीता 'निधि'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर