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खेल है सारा वक़्त और साँसों का

                
                                                         
                            खेल है सारा वक्त और साँसों का..
                                                                 
                            

वक्त चलता है साँसों के लिए,
और साँसें हैं वक्त के लिए...
बहता पानी है मौकों के लिए,
विशाल आकाश है, सिर उठाने के लिए...
धरती है पैर जमाने के लिए...

साँसें हैं आने-जाने के लिए
जिस तरह आज ने छोड़ा,
आज के लिए...
आज हूँ, फिर से उस
आज के लिए...
कहते हो, आज में
जीने के लिए-
आज में ही हूँ, आज के लिए....

—अनीता 'निधि'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 hours ago

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