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पत्रकारिता दिवस

                
                                                         
                            तीस मई शुभ दिन रहा,लिखा गया इतिहास।
                                                                 
                            
समाचार मार्तण्ड ने,जन में भरा हुलास।।

पत्रकार निष्पक्ष रह,लड़े बिना तलवार।
जन-जन की आवाज बन,लेता क्रांति मशाल।।

साहस संयम ही रहा,पत्रकार का मान।
सोच विषय संवाद से,लिखे नई पहचान।।

शुचिता का आधार ले,करे कर्म आरंभ।।
पत्रकार की लेखनी,लोकतंत्र का खंभ।

परिवर्तन के दौर में,माध्यम हुए अनेक।
समाचार की सत्यता,होती अब व्यतिरेक।।

प्रौढ़ कलम दम तोड़ती,बिकी कलम क्यों आज।
भटक गयी उद्देश्य से,रोता रहा समाज।।

नया कलेवर डाल के,भूली सहज प्रवाह।
पूंजीपति के कैद में,ढूँढे कलम गवाह।।

सहे कलम क्यों पीर नित,क्यों बैठे चुपचाप।
खड़ग बने जो लेखनी,हरे जगत संताप।।
-अनिता सुधीर आख्या
 
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3 महीने पहले

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