दर्पण कब तक तोड़ते फिरोगे,
मानते क्यों नहीं दाग चेहरे पर है...!!
खुद से कब तक भागते रहोगे,
सच के निशान तो हर चेहरे पर हैं...!!
किरदार की बात मत करो यारों,
तुम्हारा फरेब हर मोहरे पर है...!!
वक़्त तो गुज़र ही जाता है यारों,
छुपते नहीं जो ज़ख्म गहरे पर हैं...!!
दुनिया को दोष क्या देना भला!,
जो कुछ भी है पर अपने पहरे पर है...!!
अब मान भी लो हक़ीक़त अपनी, 'अदा',
इल्ज़ाम सारे तुम्हारे इसी दायरे पर हैं...!!
— अनिता दासानी
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