नयनों की बात
घूँघट की ओट छिपे नयन,
कहते मन की बात,
चुप रहकर भी छेड़ रहे हैं
स्मृतियों के तार।
केशों की लट छूकर जैसे
ठहरी हो पुरवाई,
पलकों पर जाने कब आकर
नींद बनी तन्हाई।
किस सपने की राह निहारें
ये चंचल दो नैन,
किसकी याद लिए फिरते हैं
मन में मधुर तरंगें।
अधरों पर संकोच ठहरा,
नयनों में संवाद,
एक नज़र ने खोल दिया है
मन का बंद कपाट।
इन आँखों की गहराई में
कितनी कोमल प्यास,
जैसे चुपके उतर गया हो
मन में कोई मधुमास।
जो अधरों से कह न सकी वह,
नयनों ने कह डाला,
एक झुकी-सी पलक ने जैसे
मन का भेद संभाला।
मौन खड़ा है रूप सामने,
फिर भी गीत सुनाई—
नयनों ने जो बात कही है,
शब्दों ने न कह पाई।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
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