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मोहब्बत के बाद कुछ भी पहले-सा नहीं रहता

                
                                                         
                            मोहब्बत के बाद कुछ भी पहले-सा नहीं रहता
                                                                 
                            

कभी-कभी कोई व्यक्ति
हमारी ज़िंदगी में इस तरह आता है,
जैसे किसी बंद कमरे की खिड़की से
अचानक धूप का एक टुकड़ा भीतर उतर आए।
न कोई आहट होती है,
न आने की कोई वजह समझ आती है,
बस मन के किसी अनजान कोने में
कुछ बदलने लगता है।

मोहब्बत भी शायद
किसी को पाने का नाम नहीं,
यह तो अपने भीतर
किसी दूसरे की मौजूदगी महसूस करना है।
उसकी हँसी से अपने दिन का सँवर जाना,
उसकी उदासी से अपनी शाम का ठहर जाना,
और बिना कुछ कहे भी
किसी के मन की भाषा समझने लगना है।

एक उम्र तक इंसान
अपने लिए रास्ते चुनता है,
अपनी इच्छाओं को सीमाओं में रखता है,
हर रिश्ते को नाम देने की कोशिश करता है।
लेकिन जब दिल किसी को अपना मान लेता है,
तब नामों की ज़रूरत छोटी पड़ जाती है,
और एहसास का संसार
शब्दों से कहीं बड़ा हो जाता है।

यह कैसा रिश्ता है
जिसमें कोई वादा न होकर भी प्रतीक्षा होती है,
कोई अधिकार न होकर भी अपनापन होता है,
कोई शिकायत न होकर भी
किसी की कमी महसूस होती है।
जहाँ दूरियाँ केवल रास्तों में रहती हैं,
मन के भीतर तो कोई
हर पल साथ चलता रहता है।

मोहब्बत इंसान को कमज़ोर नहीं करती,
वह उसे उसकी संवेदनाओं से मिलवाती है।
जो आँखें कभी केवल दृश्य देखती थीं,
वे अब भाव पढ़ने लगती हैं।
जो मन अपनी ही धुन में रहता था,
वह किसी और की ख़ामोशी सुनने लगता है।
और जो होंठ हर बात का उत्तर जानते थे,
वे कभी-कभी एक नाम पर आकर
बिल्कुल मौन हो जाते हैं।

किसे पता था
कि जीवन की इतनी लंबी यात्रा में
एक एहसास ऐसा भी मिलेगा,
जो न साथ चलने की शर्त रखेगा,
न ठहर जाने की ज़िद करेगा,
फिर भी मन के हर रास्ते पर
अपनी छाप छोड़ जाएगा।

शायद प्रेम का सबसे सुंदर रूप यही है—
किसी को अपनी दुनिया बना लेने से पहले
उसके अस्तित्व का सम्मान करना,
उसे बाँधने की जगह
उसकी खुशियों के लिए दुआ करना,
और अपने हिस्से में आई उसकी थोड़ी-सी रोशनी को
पूरी उम्र सँभालकर रखना।

क्योंकि कुछ लोग
हमारी कहानी में हमेशा रहने के लिए नहीं आते,
वे तो हमें यह समझाने आते हैं
कि हमारे भीतर भी
कितना गहरा सागर छिपा हुआ है।

और जब कभी कोई पूछे
कि मोहब्बत ने तुम्हें क्या दिया,
तो शायद इतना ही कहना काफ़ी होगा—

उसने मुझे किसी और का नहीं,
पहले से कहीं अधिक
अपने ही दिल का परिचय दिया है।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 दिन पहले

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