माटी का मोह~
माटी की उस सोंधी गंध में,
जाने कितने स्वप्न बसे,
कृषक-हृदय की मौन व्यथा में,
जीवन के संगीत हँसे।
धूप जली तो तन तपता है,
मेघ बरसें—मन हरषाए,
कण-कण धरती को सींच रहा,
श्रम का मोती बनकर आए।
श्यामल माटी की गोदी में,
बीज सुनहरे सोते हैं,
किसान के कोमल कर-स्पर्श से,
अंकुर बनकर रोते हैं।
प्रभात किरण जब खेतों पर,
स्वर्णिम आँचल धरती है,
तब श्रम से भीगी पगडंडी,
कोई मधुर कथा कहती है।
छाछ-रोटी की छोटी पोटली,
मन में अगणित आस लिए,
चल पड़ता वह खेतों की ओर,
अपने सुख का त्याग किए।
उसके पसीने की बूँदों में,
परिवारों के स्वप्न पलें,
उसकी मौन तपस्या से ही,
घर-आँगन में दीप जलें।
ओस-कण जैसे निर्मल मन में,
न छल, न कोई अभिमान,
माटी से उसका ऐसा नाता,
जैसे प्राणों से प्राण।
वह बीज नहीं केवल बोता,
जीवन की ऋतु बोता है,
अपने श्रम के दीप जलाकर,
भारत का भविष्य संजोता है।
हे धरती! तेरी गोद सदा ही,
उसके लिए तीर्थ समान,
तेरे कण-कण में देख रहा वह,
अपने जीवन का भगवान।
माटी का यह मोह नहीं है,
यह तो आत्मा का विस्तार—
कृषक जहाँ मुस्काता है,
वहीं खिलता है संसार॥
— अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
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