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मान जहाँ हो प्रेम में, रस बरसै अपार।

                
                                                         
                            मान धरि बैठी मानिनी, अँखियन तीर चलाय।
                                                                 
                            
नैनन की चितवन-कटुता, हिय में प्रीत जगाय॥

बोलत नहिं अधर भले, नैन कहैं सब बात।
रोष-कपोलन बीच में, छिपी मिलन की रात॥

कर बाँधे मुख फेरि के, बैठी प्रीतम पास।
जितनी दूरी दे रही, उतनी बढ़ती आस॥

कहै सजन—“अब मान तज, सुनि ले मोरी बात।”
अधर दबाए मुसुकि के, भीज गए दो नैन॥

मान भले मुख पर रहे, मन में प्रीत अपार।
रूठी-रूठी मानिनी, करती प्रेम-प्रहार॥

एक पलक की चितवनी, सौ संदेश सुनाय।
बिन बोले ही प्रेम की, सारी बात बताय॥

रूठे नैन कहैं कुछ और, अधर कहैं कुछ और।
प्रेम-पंथ की राह में, मान बना है मोड़॥

मान जहाँ हो प्रेम में, रस बरसै अपार।
रूठत-रूठत मिलि गए, दो हिय एकाकार॥ 
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 घंटे पहले

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