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जनमे नंद-दुलार ...

                
                                                         
                            भादों की अँधियारी रैन, दमकी दामिनि आज।
                                                                 
                            
नंद-भवन आनंद भयो, बाजे मंगल-बाज॥

देवकी-कुक्षि-कमल ते, प्रगटे ब्रज के लाल।
तम हरि जग उजियार भयो, जनमे नंद-किशोर॥

कारागार भए बैकुंठ, खुलि गए सब द्वार।
वासुदेव लै चले हरि, सिर धरि शेष अपार॥

यमुना उमड़ी प्रेम सौं, चरणन छूवन धाय।
चरन-कमल की छबि लखि, लहरिनि हुलसि समाय॥

नंद-भवन जब लाल भए, मंगल भयो अपार।
देव कुसुम बरसावहिं, गूँज्यो जय-जयकार॥

कोमल चरन धरत ही, धन्य भई ब्रज-धूरि।
जिस आँगन हरि खेलिहैं, सो धाम भयो भरपूरि॥

श्याम सुभग तन, नन्हीं मुसकान, नैनन मधुर उजास।
लखि मुखचंद यशोमति, भूलि गईं सब आस॥

किलकि उठे नंदलाल जब, पुलकि उठ्यो ब्रजधाम।
दधि-माखन की गंध सौं, महक उठ्यो सुखधाम॥

नंद के द्वारे गोपिनी, मंगल गावत आय।
कंचन-थार सजाय कै, प्रेम-सुधा बरसाय॥

नन्हीं मुठ्ठी बाँधि हरि, हँसि-हँसि सब सुख देत।
एक झलक में श्याम की, कोटि जनम दुख लेत॥

आजु भयो ब्रज भाग्यवान, जनमे यशोदा-लाल।
जाके नाम जपत मिटै, मन को सकल जंजाल॥

हिय में बसहिं घनश्याम तो, और न चाहत काहि।
नंद-दुलारे की कृपा, जग में दुर्लभ नाहि॥

 
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1 hour ago

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