हसरत लिए...
यही हसरत लिए
मैंने उम्र का एक बड़ा हिस्सा
दूसरों की ख़ुशियों के नाम कर दिया,
और जब कभी अपने लिए
थोड़ी-सी धूप माँगी,
मेरे हिस्से में
एक लंबी छाया आई।
मैंने रिश्तों को
पूरी ईमानदारी से जिया,
अपनी थकान छिपाकर
सबके चेहरे पर मुस्कान रखी,
मगर किसी ने नहीं पूछा—
मेरी मुस्कान के पीछे
कितनी उदासियाँ रहती हैं।
अब कोई शिकायत नहीं है,
न किसी से कोई हिसाब चाहिए,
बस इतना चाहती हूँ
कि मेरी चुप्पी को
मेरी सहमति न समझा जाए,
मेरे त्याग को
मेरा कर्तव्य कहकर
आसानी से भुला न दिया जाए।
यही हसरत लिए
आज भी चल रही हूँ—
कि कोई मुझे
मेरी ज़िम्मेदारियों से अलग भी देखे,
मेरे नाम के आगे
किसी का रिश्ता नहीं,
मेरा अपना अस्तित्व लिखे।
मैं भी एक मन हूँ,
जिसमें कुछ अधूरे सपने हैं,
कुछ इच्छाएँ अब भी साँस लेती हैं,
कुछ रास्ते हैं
जिन पर मैं कभी चली ही नहीं।
अब उम्र से नहीं,
अपने भीतर की उस स्त्री से
एक वादा करना है—
जिसने सबको सँभालते-सँभालते
ख़ुद को पीछे छोड़ दिया था।
यही हसरत लिए
अब किसी के लौटने की नहीं,
अपने भीतर लौटने की प्रतीक्षा है।
कि एक दिन
मैं आईने के सामने खड़ी होकर
बिना किसी अपराधबोध के कह सकूँ—
सबके लिए जीते-जीते
मैंने अपना जीवन नहीं खोया,
अब अपनी ख़ुशी में जीना भी
मेरा अधिकार है।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
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