दिल की बातें दिल में रखना भी कहाँ आसान है,
हर हँसी के पीछे छिपा एक गहरा राज़ है।
जिसे अपना समझकर उम्र गुज़ारते रहे,
वक़्त ने समझाया—वही रिश्ता बड़ा नाज़ुक है।
जिससे उम्मीदें थीं, वही अनजान-सा निकला,
और जिसने कुछ कहा नहीं, वही दिल के पास है।
हमने चाहा था कोई पढ़ ले हमारी ख़ामोशी,
पर यहाँ हर शख़्स अपने ही सवालों में उदास है।
दर्द को अल्फ़ाज़ दें तो समझेगा भला कौन,
दिल का हर ज़ख़्म कहाँ लफ़्ज़ों में बयाँ होता है।
कुछ रिश्ते वक़्त की आँधी में बिखर जाते हैं,
हर बिछड़ने के पीछे कोई ख़ता नहीं होती।
हमने हर दर्द को हँसकर ही सहा है अब तक,
कौन जाने हमारी आँखों में कितना सैलाब है।
कभी ख़ुद से भी मुलाक़ात ज़रूरी होती है,
भीड़ में हर शख़्स कहाँ अपना हमराज़ है।
अब किसी से हाल-ए-दिल कहने की ख़्वाहिश भी नहीं,
ख़ुद से मिलना ही हमें अब सबसे हसीं एहसास है।
मक़ता
हाल-ए-दिल ‘अनु’ किसे अपना सुनाएँ हम,
हर कोई दर्द समझे, ये मुमकिन कहाँ है।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
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