गुरु—जीवन का दीप~
अँधियारे पथ पर जब-जब
हमने स्वयं को खोया है,
गुरु बनकर दीपक तब-तब
जीवन-पथ आलोकित किया है।
उँगली थाम चलाया हमको,
गिरकर फिर उठना सिखलाया,
हार मिली तो धैर्य दिया,
जीत मिली तो विनय सिखाया।
अक्षर-अक्षर ज्ञान ही नहीं,
जीने का अर्थ बताया है,
कठिन समय में सत्य-साहस का
पथ हमको दिखलाया है।
माटी थे हम—साँचा देकर
मूरत सुंदर गढ़ते हैं,
हममें छिपे हुए सपनों को
अपने सपनों-सा पढ़ते हैं।
कितने ही दीप जले उनसे,
कितने सूरज बनकर निकले,
गुरु की एक पुकार से जाने
कितने जीवन फिर सँभले।
नमन तुम्हें, हे ज्ञान-प्रदीप!
नमन तुम्हारी साधना को,
तुमसे ही पहचान मिली है
अपनी संभावनाओं को।
शिक्षक केवल नाम नहीं है,
वह जीवन का सार है—
गुरु के चरणों में ही जैसे
हर शिष्य का संसार है।
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