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वन की उदास साँझ

                
                                                         
                            वन की उदास साँझ
                                                                 
                            

वन की साँझ उतर आई है,
मन पर कैसी छाया है;
पत्तों-पत्तों पर ठहरी है
जो पीड़ा, वह मेरी काया है।

दूर क्षितिज पर दिन का आँचल
धीरे-धीरे ढलता है,
मेरे उर का मौन प्रश्न भी
साँझ-पवन में पलता है।

नदी आज कुछ मंद बहती,
जैसे कुछ कहना भूली हो,
मेरी ही अनकही व्यथा लेकर
अपनी धारा में डूबी हो।

नीड़ लौटते विहगों के स्वर
किसको देकर जाते हैं?
मेरे सूने मन के आँगन में
किसके पग रुक जाते हैं?

एक कली थी, जिसे सँजोकर
मैंने मन में पाला था,
ऋतुएँ बदलीं, पवनें बदलीं,
वह स्वप्न अभी तक अधखिला था।

चाँद उगा तो लगा गगन में
कोई दीप जलाता है,
उसकी शीतल एक किरण में
मन अपना दुख पाता है।

वन की नीरवता के भीतर
एक पुकार उभरती है,
जैसे सोई हुई नदी में
कोई लहर मचलती है।

अब मैं अपनी पीर न कहूँगी,
वन-पथ उसे सुनेंगे,
मेरे आँसू ओस बनेंगे,
फूल उन्हें चुन लेंगे।

जब फिर मधुमय भोर खिलेगी,
पात-पात मुसकाएगा,
मेरे मन का मौन पपीहा
निज स्वर में लौट आएगा।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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