अगर मोबाइल न होता,
तो शायद ख़त लिखे जाते,
मन की सारी अनकही बातें
काग़ज़ पर उतर आतीं।
न संदेशों की खनक होती,
न तस्वीरों का सिलसिला,
दूर बैठे अपनों से मिलने का
बस ख़्वाब हुआ करता।
न जाने कितने हुनर हमारे
मन में ही सोए रहते,
कितने शब्द, कितनी कविताएँ
काग़ज़ तक भी न आते।
न कोई पल कैमरे में रुकता,
न यादों का एलबम होता,
जो आज हथेली में सिमटा है,
वो अपना-सा आलम होता।
कभी माँ बनकर ज्ञान दिया,
कभी दोस्त बनकर साथ चला,
कभी उलझे मन को राह दिखाई,
कभी हुनर का दीप जला।
पर सच यह भी है—मोबाइल ने
दुनिया को पास तो कर दिया,
मगर कभी-कभी पास बैठे
अपनों को हमसे दूर किया।
इसलिए इसे वरदान बनाएँ,
बंधन इसका बनने न दें,
तकनीक रहे अपने हाथों में,
हम इसके हाथों में न रहें।
मोबाइल केवल साधन है,
जीवन का आधार नहीं;
रिश्ते, संवेदनाएँ, अपनापन—
इनसे बढ़कर संसार नहीं।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
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