2 जून सिर्फ तारीख नहीं, एक नारा था,
"जय तेलंगाना" जो हर गली में पुकारा था।
दशकों का सपना, लाठियों की मार सही,
आँसू, आंदोलन, और उम्मीदों की स्याही।
गोदावरी- कृष्णा के आँचल में पला था दर्द,
हक़ की लड़ाई में बीते बरसों तक संघर्ष।
भाषा अपनी, बोली अपनी, पहचान का सवाल,
दिल्ली से दखल तक चला लंबा बवाल।
फिर आई वो सुबह, 2 जून 2014,
नक्शे पर उभरा एक नया रंग गाढ़ा।
29वां तारा जुड़ा भारत के आसमान में,
हैदराबाद ने पहना स्वाभिमान का गजरा।
ये जीत है उस किसान की जो धरने पर बैठा,
उस छात्र की जो किताब छोड़ सड़क पर डटा।
ये जीत है कोयला खदान के मजदूर की,
जो अपने हिस्से का सूरज माँगता रहा।
2 जून बताता है कि देर से ही सही,
मगर हक़ मिलता है लड़ने वालों को यहीं।
तेलंगाना सिर्फ राज्य नहीं, एक जज़्बा है,
जो कहता है — अपनी किस्मत खुद लिखो,
अपना कलाम खुद गढ़ो।
-अनिता चतुर्वेदी
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