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दिल पे जिसेको ले बैठे हो

                
                                                         
                            बिन देखे अपने लगते हो
                                                                 
                            
बातों से हमको छलते हो
कुछ अंदाज लगाता हूं मैं
चांद से क्यों इतना जलते हो
जिस दिन बात नहीं हो पाती
शायद हाथ मला करते हो
सूनी आखों से शायद तुम
दूर दूर देखा करते हो
लोगों से यह बात सुनी है
कोई रोग लगा बैठे हो
ऐसी कोई बात नहीं थी
दिल पे जिसेको ले बैठे हो
हमको तो ऐसा लगता है
इंसां तुम भी ठीक नहीं हो
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
28 मिनट पहले

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