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इतनी आहिस्ता से सूरत बदलती क्यों है

                
                                                         
                            वक्ते रुखसत कोई भी लफ़्ज न आया लब पे
                                                                 
                            
सोच रखा था हमने कहने को क्या क्या उससे
अब कोई लहर भी आती नहीं खुशी की तरह
अब तो अच्छा नहीं लगता है आना साहिल पे
कोफ्त खुद पे कभी औरों पे आती ही रही
ध्यान कम अपना रहा जाता दिल की धड़कन पे
कोई कंकण जो गिरा झील की छाती पर तो
चांद छुपने सा लगा बादलों के चिलमन में
इतनी आहिस्ता से सूरत बदलती क्यों हैं
देखता रहता हूं खुद को भी मन के दर्पण में
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एक घंटा पहले

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