जिंदगी जब जब भी मुस्कुराई है
मौत ने भी ली कहीं अंगड़ाई है
जिस आंगन में सुबह थे उजाले आए
वहीं पर शाम को बड़ी सी परछाईं है
कभी है लू तो कभी सर्द हवाएं हैं यहां
मौसम ने अपनी अदाएं हमें दिखलाई है
भर नजर देखता हूं सभी नज़ारों को
जैसे कायनात निगाहों में सिमट आई है
यह समझकर मैं अपनी राह चला चलता हूं
अपनी ये दुनिया चलाती कोई खुदाई है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X