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जी नहीं होता है कुछ कहने को अब

                
                                                         
                            जी नहीं होता है कुछ कहने को अब
                                                                 
                            
सोचता अक्सर हूं चुप रहने को अब
मर रहा हर शख्स जीने के लिए
जी रहा शायद कोई मरने को अब
मुल्तवी रखा था आखिर के लिए
सोचता हूं सब वही करने को अब
शोर से मेरे, कोई सोई नदी
हो गई तैयार है ,बहने को अब
सीख पाया मैं कभी रोना नहीं
रह गया है कुछ नहीं हंसने को अब
बारिशों ने जब गिरा छप्पर दिया
जा रही दीवार भी ढहने को अब
शहर को फिर से बसाना है हमें
बस्तियां तैयार हों मिटने को अब
मेरे लफ्जों के जहां छींटें पड़े
जा रहा है दिल में कुछ जलने को अब
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11 घंटे पहले

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