आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आईना धोकर आया

                
                                                         
                            जश्ने बहार होकर आया
                                                                 
                            
मैं सभी ग़म खोकर आया
अभी कहीं खो गया हूं मैं
किस गली से होकर आया
आंसू खुद ही पोंछने पड़े
फिर कभी न राे कर आया
अक्स मेरा निखरा भी नहीं
कई दफा आईना धोकर आया
दरिया हैरत से तकता है मुझे, मैं
भँवर में खुद कश्ती डुबोकर आया
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर