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चांद सूरज हैं निकलते भी हैं

                
                                                         
                            जज्बा है जरा हसरतें भी हैं
                                                                 
                            
प्यार है कुछ वहशतें भी हैं
दूर मुझसे रहो, ये अच्छा है
चाहत है यहां नफरतें भी हैं
सदियां कभी रुक जाती हैं
लम्हें यहां से गुजरते भी हैं
एक दिल है,दिलवर हैं कई
वादा करते हैं,मुकरते भी हैं
जो बुलंदियों पे काबिज हुए
कितनी नजरों से उतरते भी हैं
सिर्फ कहते ही नहीं हैं कुछ हम
हो जो दरकार तो करते भी हैं
शामो शहर रोज डूबते हैं मगर
चांद, सूरज हैं निकलते भी हैं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
45 minutes ago

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