इत्तेफाक न रखते हुए भी साथ रह गए
हम मिल न सके करते मुलाकात रह गए
हम इश्क की आंधी में यूं भी उड़ न जाएंगे
वो खाक थे हरदम जमीं के साथ रह गए
अच्छे जवाब तुम दिया करते थे बावजूद
जेहन में मेरे कितने सवालात रह गए
तन्हाईयों की भीड़ में क्या क्या न खो दिया
हम ढूंढते अपने सभी जज़्बात रह गए
अपनी अना है अब भी आसमान से लगी
तुम नापते अब भी मेरी औकात रह गए
कितना भी बरगलाया जमाने ने क्या हुआ
दिल में पुराने मेरे खयालात रह गएरह गए
मंजिल का क्या ठिकाना सफर की खबर नहीं
हम हर दफा ही करके शुरुआत रह गए
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