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जो उलझा रहा अपने नफे के हिसाब में

                
                                                         
                            भर चला है दिल भी इश्क़ो अजाब से
                                                                 
                            
मालूम हो रहा है उसके हर जवाब से
थी खौफनाक बात की आहट से भी मेरे
चेहरा नहीं हटाया था उल्टी किताब से
पहचान के भी आंखें मैं पहचान न पाया
चेहरा नहीं निकाला भी उसने नकाब से
था प्यार मेरा मै उसे पहचान न पाया
जब तक कि वो आने न लगा मेरे ख्वाब में
रूमानियत पहले मुझे कुछ नापसंद थी
पर जी मेरा लगता नहीं था इंकलाब में
क्या बात हो गई तेरे कस बल हुए ढीले
पहले चला भी करता था,अलग रुआब में
रंगत को लेके उसकी सिर्फ मैं चला आया
जो उलझा रहा अपने नफे के हिसाब में
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2 घंटे पहले

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