मैं ढलता हुआ दिन, तू जवां होती रात है
अपनी किस्मत में कहां कोई मुलाकात है
लाजबाब इस कदर भी होना नहीं था हमें
बिन जवाब तन्हा अपने सारे सवालात हैं
छत से अपने मैं अक्सर नजारे करता हूं
शोर बहुत दिल में है ,और गूंगी कायनात है
हैं बिखर गया सब कुछ, सब कुछ समेटूंगा
लम्हें बस सिमट रहे हैं बिखरते जज्बात हैं
उम्र बीत जाती है कुछ अधूरेपन के साथ
इस सोच में गुम भी किसके खयालात हैं
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