आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पुरानी ये रवायत हो रही है

                
                                                         
                            तेरी इतनी इनायत हो रही है
                                                                 
                            
मेरी कितनी शिकायत हो रही है
नहीं करता है जी तुम पर करूँ शक
बहुत मुझसे शराफत हो रही है
उदास हो जाना मेरा शगल था
मगर हंसने की आदत हो रही है
खुशी का जाम छलका जा रहा है
खराब मेरी हालत हो रही है
खनक आवाज में, पुरनूर सूरत
कयामत पे कयामत हो रही है
कभी आएंगे ये नुस्खे अमल में
अभी खलिश कवायद हो रही है
हमें माफिक नहीं हो तो हटो तुम
किराए की बगावत हो रही है
रुंधी आवाज कोई आ रही है
कोई पूजा, ईबादत हो रही है
शिकायत उससे है लेकिन है मेरा
पुरानी ये रवायत हो रही है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
52 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर