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अगर आवाज़ हम देते, जमाना क्या नहीं आता

                
                                                         
                            लुटाना कुछ नहीं आता, बचाना कुछ नहीं आता
                                                                 
                            
चले थे बादशाह बनने बनाना कुछ नहीं आता
सुना था इश्क में मिलते वफ़ा के भी खजाने हैं
जफ़ाएं होती हैं हासिल खजाना कुछ नहीं आता
जो लौटे इश्क की गलियों से रुस्वा हो के तो पूछा
कहो क्या आता है साहब कहा ना कुछ नहीं आता
जिसे हम छोड़ आए हैं मुनासिब क्या उसे देखें
जो आना चाहते आने का बहाना क्या नहीं आता
हुए ही तुम नहीं हासिल,तो दुनिया है अधूरी सी
कभी औरों से भी पूछो हमें क्या क्या नहीं आता
छुपा के दिल में हम अपने कई तूफान रखते हैं
तुम्हारी याद का क्या है,मिटाना क्या नहीं आता
बहुत कुछ सोचकर हमने नहीं छेड़ा है मौजों को
यहां दरिया है आंखों में बहाना क्या नहीं आता
हमें आदत पुरानी है हम खुद के साथ रहते हैं
अगर आवाज़ हम देते, जमाना क्या नहीं आता
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एक घंटा पहले

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