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हर सांस इम्तिहाँ

                
                                                         
                            ढूंढता तो हूं सकून ए दिल कहां कहां
                                                                 
                            
कहीं भी रुक नहीं सका है ये कारवां
मेरे ख्याल ही थे ठहरे रुके रुके से
वर्ना ये कायनात थी हरदम रवां रवां
हम उम्र की चादर को ओढ़े हुए अभी
मूंदे हैं आंख कितने,नजारे जवां जवां
वो आग बुझ गई है,रह गईं निशानियां
उठ रहा है आज भी उदास सा धुआं
गुजरी बयार लौटकर आती नहीं कभी
कुछ याद में, सदमे में डूबा है गुलिस्तां
रखता है कौन याद पुरानी कहानियां
किस्से नए सुनते हैं अब तो जुबां जुबां
क्या जुर्म हुआ है,या कोई खता हुई
दिल रोज सुना करता है मेरा वही बयां
होता जो इख्तियार, तो दुनिया में न आते
लेती है जिंदगी यहां हर सांस इम्तिहाँ
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48 minutes ago

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