दिल उदास करने का कोई बहाना चाहिए
हो निशानेबाज़ क्या तुमको निशाना चाहिए
हम किनारे आ लगे हैं पर हमें अफसोस है
नाखुदा का नाम लेकर डूब जाना चाहिए
माँगने से फल कोई देते नहीं हैं ये दरख्त
क्या हमें भी हाथ में पत्थर उठाना चाहिए
बस गमों के हैं अंधेरे रास्ते दिखते नहीं
रोशनी के वास्ते कुछ तो जलाना चाहिए
चार दिन की हैं बहारें फिर खिजां के दौर हैं
है रवायत ही मगर गुलशन सजाना चाहिए
हमकदम हमराह की अब बात बेमानी हुई
अब किसी मंजिल पे हमको रुक भी जाना चाहिए
जिंदगी उम्दा है कितनी,जिंदगी नाचीज़ है
याद रखने के लिए कुछ तो भुलाना चाहिए
रूठकर कोई गया था,घर से इक अर्सा हुआ
ढूंढकर उसको मनाकर घर बुलाना चाहिए
रात सजकर चांदनी में तारों से करती है बात
कुछ घड़ी के वास्ते ही झिलमिलाना चाहिए
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