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कशमकश, उलझनों की जागीर है

                
                                                         
                            रंग उड़ती जिसकी वो तस्वीर है
                                                                 
                            
गर्दिशों में गुम कोई तकदीर है
कोई परिंदा न आए नोक पर
फिर हवा में उड़ता कोई तीर है
भूल भी जाऊंगा मैं ये वाकया
पीर पर होती गई बेपीर है
चाहता तो,आ जाता,जाता चला
किसके पैरों में पड़ी जंजीर है
कौन पढ़ पाया है,जो होने को है
माथे पर जो अनबुझी तहरीर है
जेहन में औरों के ये ख्याल क्यूं
रूह है मेरी,मेरा शरीर है
सल्तनत आवारगी की है मिली
कशमकश, उलझनों की जागीर है
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6 घंटे पहले

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