सकल,शकल(संपूर्ण, खंड)
सकल था मन कभी नदी-सा,
निर्मल, निश्चल, गहरा था,
एक किनारा सबका अपना,
एक ही जल में चेहरा था।
कब स्वार्थों की धूप पड़ी फिर,
सूख गईं संवेदनाएँ,
बिखरी आत्मा की धरती पर
उग आईं अनगिनत छायाएँ।
रिश्तों के इस टूटे दर्पण में
चेहरे कितने दिखते हैं,
सकल प्रेम के स्वप्न मगर अब
शकल-शकल में बँटते हैं।
फिर कोई करुणा का बादल
सूखी धरती पर बरसे,
मन के भीतर सोया मानव
अपनेपन से फिर सँवरे।
जिस दिन ‘मैं’ से ऊपर उठकर
‘हम’ का दीप जलेगा,
बिखरा हुआ-सा जीवन फिर से
सकल रूप ढलेगा।
-पंडित अनिल
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