आँखों में डर बसा है कि क़ुदरत करेगी क्या
माहौल है अजीब तो हिम्मत करेगी क्या?
बर्बाद कितना कर गया सैलाब ज़िंदगी
आगे न जाने और ये नफरत करेगी क्या?
आबाद होने में तो लगेंगे कई बरस।
गिरती हुई पहाड़ से आफत करेगी क्या?
सड़कें नहर बनी हैं अजब ज़िंदग़ी हुई
देखेंगे दोस्त और ये ज़ुल्मत करेगी क्या?
ऐसा मिला है ज़ख़्म कि नस्लें करेंगी याद
आँखें ये फिर किसी से मुहब्बत करेंगी क्या?
-पंडित अनिल
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