करार सावन का
बरस में इक ही दफा है बहार सावन का
तुम्हीं तो भूल गए हो करार सावन का।
सजन ये झूठ पे जो झूठ बोलते हो तुम
कभी हो जाओगे तुम भी शिकार सावन का।
घिरे हैं मेघ ये काले नज़र लगा देंगे
चढ़ा के मानेंगे मुझपे बुखार सावन का।
रहे न याद ज़माने की बात कुछ भी मगर
न भूलता है कभी पहला प्यार सावन का।
खिले-खिले से चमन हैं अनिल जिधर देखो
इसी को कहते हैं असली ख़ुमार सावन का।
-पंडित अनिल
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