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मैं मजदूर, मैं मजबूर

                
                                                         
                            मैं मजदूर हूं , मैं मजबूर हूं
                                                                 
                            
मजदूरी करके दो वक्त की रोटी कमाता हूं ।
कभी कभी तो बिना खाए सो जाता हूं ।
पर मेरे भी खुद के सपने है
मैं भी किसी से प्यार करता हूं ।

मैं मजदूर हूं , मैं मजबूर हूं
कभी कभी सोता नहीं हूं उसकी यादों में
छोटा सा फोन रखता हूं
वीडियो कॉल नहीं कर पाता
काम इतना हैं, कि बात नहीं कर पाता
लेकिन हर वक्त फिक्र रहेती है
उसने कुछ खाया भी होगा या नहीं

मैं मजदूर हूं , मैं मजबूर हूं
रहेता हूं बड़ी दूर तुमसे
सो जाता हूं कहीं भी तुम्हारी याद में
पर तुम्हें खुश रखने के लिए
मनी ऑर्डर समय समय पर करता रहता हूं

मैं मजदूर हूं , मैं मजबूर हूं
बयान नहीं कर सकता किसी को
कितना याद करता हूं तुम को
कितना प्यार करता हूं तुम से
मेरा तो कहीं ठिकाना नहीं
आज यहां तो कल वहा
पर तेरा ठिकाना याद रहता है हमेशा
मैं मजदूर हूं , मैं मजबूर हूं


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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