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कोशिश तो कर वल्लभा !

                
                                                         
                            ओ प्राणवल्लभा मेरी प्राणेश्वरी
                                                                 
                            
क्या कर रही हो ये तुम ?
कभी चूल्हा चौकी,
कभी घर गृहस्थी,
क्या ? यही है तेरी हस्ती ।

माना थोड़ी उलझ चुकी हो ।
अपनों से ही जूझ रही हो ।
अब तो हिम्मत कर ले थोड़ा ।

क्या होगा ? फिर गिर जाओगी ।
कोशिश तो कर वल्लभा,
संभल जाओगी ।
अपनी दुनिया ख़ुद बसा लोगी ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

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