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यकीनन उन्हीं की नजर में कमी है

                
                                                         
                            मेरी जिन्दगी में बस इक तुही है,
                                                                 
                            
तेरे प्यार की जरूरत बडी है !

तेरे दिल में क्या है मुझे भी बतादे,
मेरी जिन्दगी में बडी बेबसी है !

न मजदूर को इतना मजबूर कर,
एक-एक दाने की उसको पड़ी है !

कि मंहगाई इतनी ज्यादा बडी है,
गरीबों के सिर पे मुसीबत खड़ी है !

यह सरकार मुझको समझेंगे कैसे,
यकीनन उन्हीं की नजर में कमी है

- आनन्द गुर्जर सहोदर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
37 मिनट पहले

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