आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सफर सफर सफर

                
                                                         
                            हम निकल तो पड़े हैं राहों में अब ना जाने कहा जाना होगा,
                                                                 
                            
ना जाने मंजिल कहाँ होगी ना जाने कहाँ ठिकाना होगा,
दिल है के अब भी परेशान है कोई बता दे हमें उसने देख के
पहचाना होगा,
वक़्त है के फ़िसलता जा रहा है हाथों से रेत की तरह क्या याद
उसको गुज़रा जमाना होगा,
उमर चलते चलते थक गई है उम्मीद मे मेरी
क्या अब गहरी नींद के लिए कोई सरहाना होगा,
कशमकश है जिंदगी के सफर में बड़ी जो दिखाये हमें हकीकत
क्या किसी के पास वो आईना होगा,
क्या चुन लिया है रास्ता गलत हमने क्या फिर से हमें आगाज़ से
अंजाम तक जाना होगा,
ना जाने मंजिल कहाँ होगी ना जाने कहाँ ठिकाना होगा,
हम निकल तो पड़े हैं राहों में अब ना जाने कहां जाना होगा,
- आनंद 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर