गुल गुलजार था कभी
वक़्त के थपेड़ों ने पतझड़ बना दिया
कभी धड़का करता था देख कर
आईना , हालातों ने उस आईने को
आज सिसकना सिखा दिया !!
मिला कर आंखों से आँखें
खुद ही सवाल करने लगी
वो ख्वाब कहां गए छोड़ कर
तन्हा हमें , जिनकी ख्वाहिश
में गुजरी कई रातें !!
थक कर कदमों ने पूछ ही लिया
मंज़िल की खबर भी है तुझे
कि लापता राहों में बेवजह तू
यूं हमको भटका रहा !!
लिखते रहूं जो पन्ने भरेंगे न
स्याही खत्म हो जाएगी
न वक़्त करवट बदलता है
न बैचेनी खत्म होती है !!
जहां से शुरू की थी
बात वही आ कर
अटक जाती हैं
मौन हो जा अब तो
ज़िंदगी यूं समझाती हैं !!
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