वक़्त का बहाव , जाने कहां से कहां
ले जाएगा कस्ती ए ज़िंदगी
रूख हवा का भी नश्तर ही रहा
बड़ी ख़ौफ़ नाक रही गरजती बिजलियों
की कहकशी !
कितने तूफानों से गुज़र कर ज़िंदा रही
हस्ती मेरी , यक़ीनन तेरे क़रीब का हूं ख़ुदा मेरे
वरना सलामत रहता मैं इतनी कहां थी औकात मेरी !!
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