दिल के आकाश में इस क़दर सूनापन छा गया
चांद भी देख के इस अमावस्य को घबरा गया
अश्कों ने बारिश की पर भीग न पाया मन
गूंज उठी पूरी कायनात मेरे , दिल के चित्कार से
सहज होके खुद ही उठा ली मैने तब कलम
लिख डाला सब मैने अपने लहू से कि दिल पे कोई मलाल न बाकि रहे ,आशिकी का भूत सर पर न बाकि रहे ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X