तुम मेरे हो , मेरे ही रहना
तुम से मुझे बस इतना ही है कहना
तुम्हारी खामोशियां पढूं मैं
मेरी अंखियों को तुम पढ़ लेना
इक तेरे सिवा मुझको
दुनियां से क्या लेना - देना
तुम मेरे हो मेरे ही रहना
वक़्त तकाजा ही सही
हम पास नहीं दूर ही सही
इन दूरियों को भी
अपने एहसासों से हमें
कम है कर देना
तुम मेरे हो मेरे ही रहना
मुहब्बत में जुदाई का सितम
इक दस्तूर है सनम
इस दस्तूर को भी
सह लेंगे हम
पर याद रखना इतना
मेरी डोली आएगी
सिर्फ और सिर्फ तेरे ही अंगना
तुम मेरे हो मेरे ही रहना !!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X