संघर्ष में जन्मी इक कहानी
अनाम नाम की है ये जिंदगानी
मुट्ठी में थे रिश्ते जो रेत से फिसल गए
न पैरो के नीचे जमीं थी न था सर पे आसमा
उसने कभी नहीं कहा कि खुद अपनी तक़दीर
लिख लेगी , बस था ये जज्बा की देखते हैं
किस्मत कितना सितम करेगी
इस उम्मीद पे कायम था उसका जहां
कि ख़ुदा आके खुद उससे पूछे की
बता तेरी रज़ा है क्या !!
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