आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

संघर्ष में जन्मी इक कहानी

                
                                                         
                            संघर्ष में जन्मी इक कहानी
                                                                 
                            
अनाम नाम की है ये जिंदगानी
मुट्ठी में थे रिश्ते जो रेत से फिसल गए
न पैरो के नीचे जमीं थी न था सर पे आसमा
उसने कभी नहीं कहा कि खुद अपनी तक़दीर
लिख लेगी , बस था ये जज्बा की देखते हैं
किस्मत कितना सितम करेगी
इस उम्मीद पे कायम था उसका जहां
कि ख़ुदा आके खुद उससे पूछे की
बता तेरी रज़ा है क्या !!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर